Saturday, 18 June 2011

गांधीवादी आंदोलन की सीमाएं

पिछले दो महीनों में तीन घटनाएं विशेष रूप से सामने आई हैं. पहली 5 अप्रेल को अन्ना हज़ारे द्वारा शुरू किया अनशन, दूसरी 5 जून से बाबा रामदेव द्वारा शुरू किया गया अनशन और तीसरी गंगा में किए जा रहे खनन को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे संत निगमानंद की 115 दिनों के अनशन के बाद मौत.
इन तीनों घटनाओं का उद्देश्य भूख हड़ताल द्वारा सत्ता को अपनी माँगे मनवाने के लिए मजबूर करना था. इन तीनो घटनाओं से जो महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं उन पर विचार करते हैं -
अन्ना हज़ारे ने लोकपाल बिल के लिए अनशन किया. सरकार ने अन्ना की माँग मानते हुए लोकपाल बिल के लिए ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन कर अन्ना की अनशन तुड़वा दी.
दूसरी घटना में बाबा रामदेव ने 5 जून को रामलीला मैदान में विदेश से काला धन वापस लाने के लिए अनशन शुरू किया. रात को दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान में जुटी भीड़ पर आँसू गैस के गोले दागे, लाठियां बरसाईं और बाबा रामदेव को पकड़ कर हरिद्वार खदेड़ दिया.
तीसरी घटना में संत निगमानंद, गंगा नदी में अवैध खनन के विरुद्ध 19 फरवरी 2011 से हरिद्वार में भूख हड़ताल पर बैठे थे 27 अप्रेल को उनकी हालत खराब हुई और वे जौलीग्राण्ट में भर्ती कराए गए. अंततः उन्होने 115 दिन भूख हड़ताल पर रहते हुए 13 जून 2011 को अपने प्राण त्याग दिए.
अन्ना हज़ारे की अनशन के बाद जैसे शासक वर्ग में जोश की एक लहर दौड़ पड़ी थी. कॉर्पोरेट मीडिया ने इस अनशन को आज़ादी के बाद की सबसे बड़ी लड़ाई तो किसी ने आज़ादी की दूसरी लड़ाई कहा. सबसे ज़ोरदार तरीके से जो बात कही गई वह यह कि ये गांधीवाद की बहुत बड़ी जीत है. गांधीवाद की बहुत बड़ी जीत बता कर उसका ज़बरदस्त महिमा मंडन भी कराया गया .
दर अस्ल गांधीवाद के रूप में शासक वर्ग के हाथ में एक ऐसा हथियार लग गया है जिस के द्वारा उसे हर जनांदोलन को कुचलने की सहूलियत मिल जाती है. जब भी जनता में सत्ता वर्ग को लेकर कोई आक्रोश फूटता है शासक वर्ग गांधीवाद की दुहाई देकर उसे दबाने की कोशिश करता है. आश्चर्य की बात नहीं है कि दुनिया के क्रूरतम देश अमेरिका का राष्ट्रपति गांधीवाद को श्रेठ विकल्प घोषित करता है और अपने आपको गांधीवादी बताता है. इसलिए अन्ना हज़ारे की अनशन को शासक वर्ग ने ज़ोरदार तरीके से गांधीवाद की जीत के रूप में स्थापित किया तो इस में आश्चर्य की बात नहीं है.
अब अन्य दोनों घटनाओ पर नज़र डालिए. अन्ना, रामदेव और निगमानंद तीनों की राजनीति, उद्देश्य व मन्शा में फ़र्क हो सकता है लेकिन तीनों ने लड़ाई की जो शैली अपनाई वह एक जैसी यानी गांधीवादी ही थी. फिर तीनों की अंतिम परिणति में इतना अंतर क्यों आया? अन्ना के आंदोलन को शासक वर्ग ने हाथों हाथ लिया और उसके महिमा मंडन में मीडिया ने सारी हदें तोड़ दीं. पूँजीपतियों ने उसे प्रायोजित किया(अन्ना के 4 दिन के आंदोलन के लिए कुल 8287668 रु. जुटाए गए. उनमें से अकेले जिंदल एल्युमिनियम ने 25 लाख व सुरेंद्र पाल नामक उद्योगपति ने 16 लाख रु. दिए) खुद सरकार ने आंदोलन को पुलिस व प्रशासन द्वारा सुरक्षा प्रदान की. दूसरी ओर उसी तरह अनशन पर बैठे रामदेव पर प्रशासन ने आँसू गैस छोड़ी, लाठियां भांजी और उन्हे दिल्ली से उठाकर हरिद्वार खदेड़ दिया. उसी तरह गंगा में अवैध खनन रोकने के लिए 4 महीने से भूख हड़ताल पर बैठे निगमानंद की सरकार ने बात तक न पूछी और उनकी जान ले ली. इसी तरह मणिपुर की इरोम शर्मिला हैं जो सरकार के एक क्रूर कानून को हटाने की माँग को लेकर 2000 से भूख हड़ताल पर बैठी हैं और सरकार उनकी कोई बात नहीं पूछ रही. इससे एक बात सिद्ध होती है. अगर आप गांधीवादी तरीक़े से कोई आंदोलन चला रहे हैं तो उसकी सफलता या असफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उससे सत्ता वर्ग के निजी हित कितने प्रभावित होते हैं और वह शासक वर्ग के सामने कितनी चुनौती खड़ी कर पाता है. दर अस्ल शासक वर्ग को गाँधीवादी शैली के जनांदोलनों से कोई डर नहीं होता. वह व्यापक जनाधार से डरता है. उसे हमेशा यह डर रहता है कि यदि उसकी माँगे नहीं मानी तो जनता हिंसा पर उतर सकती है और उसके सामने बड़ी चुनौती पेश कर सकती है. अगर उसे इस बात का खतरा न हो तो कोई सालों भूख हड़ताल पर बैठा रहे या उससे उसकी मौत ही क्यों न हो जाए सत्ता वर्ग पर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. इरोम शर्मिला और संत निगमानंद सहित ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं .
दूसरी तरफ़ अनशन पर बैठे रामदेव को सरकार 24 घंटे भी नहीं झेल सकी. 20 हज़ार लोगों की भीड़ साथ होते हुए भी सरकार ने उसका दमन करते हुए रामदेव को दिल्ली से बाहर खदेड़ दिया. बहुत से लोग सोच रहे हैं कॉग्रेस ऐसा कर के अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है पर ऐसा लगता नहीं. दर अस्ल कॉग्रेस की रणनीति स्पष्ट है. उसे पता है रामदेव अन्ना नहीं हैं. 10 साल में उन्होनें जो अकूत संपत्ति इकट्ठी की है वह सब सफ़ेद नहीं है. भले ही रामदेव ट्रस्ट जैसे कनून का फ़ाइदा उठा ले जाएं पर कॉग्रेस जनती है अगर जाँच कराई जाएगी तो सब कुछ रामदेव के पक्ष में ही नहीं जाएगा. और अंततः वह जनता के बीच रामदेव की भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई की न सिर्फ़ पोल खोल देगी बल्कि यह भी साबित कर देगी कि रामदेव ख़ुद उससे अलग नहीं हैं. दूसरे वह जानती थी कि रामदेव के साथ जो 20 हज़ार जनता इकट्ठी हुई है यह आंदोलन करने वाली जनता नहीं है. इसे थोड़े से बल प्रयोग से खदेड़ा जा सकता है. तीसरे कॉग्रेस को पता था कि भले ही अन्ना का इस्तेमाल राजनीतिक अपने अपने तरीके से करना चाहते हों पर स्वयं अन्ना की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है जबकि रामदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा न सिर्फ़ कॉग्रेस के लिए चुनौती खड़ी कर सकती है बल्कि बीजेपी रामदेव के साथ जो रणनीति बुन रही है अगर वह उसमें सफल हो गई तो बीजेपी रामदेव के साथ मिलकर कोई हिंदूवादी लहर पैदा कर उसके लिए राजनीतिक खतरा न पैदा कर दे. इसलिए इससे पहले कि रामलीला मैदान में किसी राजनीतिक रामलीला का मंच तैयार होता कॉग्रेस ने उसे 12 घंटे के अंदर ही तितर वितर कर दिया.
जहाँ तक निगमानंद या इरोम शर्मिला का मामला है सत्ता वर्ग को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. एक निगमानंद क्या हज़ार निगमानंद ऐसे अनशन कर के प्राण दे दें उसे उससे कोई लेना देना नहीं है. इस लिए जनता को किसी भुलावे में नहीं रहना चाहिए. और सत्ता वर्ग के गांधीवादी हथियार की सच्चाई को समझना चाहिए.

Friday, 27 May 2011

भ्रष्टाचार जिसे आमतौर पर भ्रष्टाचार ही नहीं समझा जाता

तमाम तरह के भ्रष्टाचार समाज में उजागर होते रहते हैं. आज भ्रष्टाचार समाज में इस क़दर हावी है कि आम आदमी ने भ्रष्टाचार को वर्तमान सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न अंग समझ लिया है. आज आए दिन बड़े - बड़े भ्रष्टाचार उजागर होते रहते हैं. लेकिन तमाम तरह के भ्रष्टाचार ऐसे हैं जिनके बारे में लोगों का ध्यान बिलकुल नहीं जाता है जबकि ये किसी बड़े भ्रष्टाचार से बिलकुल कम नहीं होते. मैं यहाँ एक उदाहरण दे रहा हूँ-
आँकड़े बताते हैं देश में 80 करोड़ से अधिक मोबाइल धारक हैं जिन्हें ऐअरटेल, वोडा, टाटा, रिलायंस जैसी तमाम कंपनियां अपनी सेवाएं प्रदान करती हैं. ये कंपनियां प्रतिदिन करोड़ों की ठगी करती हैं. जैसे बिना बताए टॉन लगा देती हैं और पैसे काट लेती हैं. दर अस्ल इन कंपनियों के पास ठगी करने के हज़रों तरीक़े है. कुछ घटनाएं जिनका मैं भुक्तभोगी रहा हूँ उनका ज़िक्र मैं यहाँ करता हूँ-
सन 2005 में हच कंपनी से एक व्यक्ति मेरे पास आया और उसने मुझे एक प्लान समझाया. जिसमें 300 रु. माह के पोस्ट पेड रेंटल 450 मिनट फ़्री थे( जहाँ तक मुझे याद आ रहा है) बाद में पता चला वे लोकल हच से हच पर थे. प्लान लेने के बाद जब उसके एक्ज़िक़्युटिव ने मुझसे बात की और मैंने उससे कहा कि तुमने मुझे चीट किया है तो उसका जवाब था - कंपनी हमें इसी बात के पैसे देती है. इसी तरह कई बार मेरे 20-30 रु यह कह कर काट लिए गए कि आपने गेम,पिक्चर य वाल पेपर डाउनलोड किया है. कुछ माह पहले मेरे रिलायंस के नंबर पर 20 रु माह बार मैसेज पैक के काट लेता था. एक बार उस पर यह पैक डलवाया था उसके बाद जैसे सिलसिला चल पड़ा. कई बार उसे डिएक्टिवेट करने की कोशिश की. हर बार रिक्वेस्ट फॉरवर्ड करके 3 दिन में डिएक्टिवेट करने के लिए बोलता था और उसके बाद फिर एक्टिव कर देता था. दर अस्ल ऐसा नहीं है कि उनके पास तकनीक का अभाव है, अगर वे चाहें तो 5 सेकंड में दिएक्टिवेट कर सकते हैं लेकिन वे ऐसा इसलिए करते हैं कि उनकी नीयत ख़राब है और वे किसी भी बहाने से उपभोक्ता का पैसा लूटना चाहते हैं. ऐसे ही आप अपने फॉन पर इंटरनेट पैक डलवाते हैं. आप यह सोचकर नेट खोलेंगे कि आपने पैक डलवा लिया है. जब आप सर्फ़ कर चुके होंगे तो आपका बैलेन्स कट जाएगा. आप कस्टमर केयर पर बात करेंगे तो बताएगा कि आपका पैक 24 घंटे बाद एक्टिव होगा. कोई दूसरी कंपनी और अधिक बदमाशी कर सकती है मतलब पैसा तुरंत न काट के 4-6 घंटे बाद काटेगी और तब तक आप 1-2 बार और नेट खोल चुके होंगे. इस तरह हम देखते हैं कि कंपनियों के पास बेइमानी करने के हज़ार तरीक़े हैं. मॉबाइल आज हर आदमी की ज़रूरत बन गया है परंतु आम आदमी कंपनियों की इस लूटपाट से खासा त्रस्त है. कोई सर्विस कॉल आती है तो लोग तुरंत उसे डिकनेक्ट कर देते हैं मानो पूरी बात सुनने भर से उनके पैसे कट जाएँगे.
इस तरह कंपनियां करोड़ो की रोज़ बेइमानी करती हैं. बहुत से भोले-भाले लोग सोचते हैं कि इसके लिए कॉर्ट कंज्यूमर फ़ॉरम वगैरह बने हैं अगर समाज में चेतना हो तो इन्हें रोका जा सकता है. कई साल पहले मैने अखबार में एक खबर पढ़ी थी. एयरटेल ने एक लड़की के नंबर पर कॉलर टॉन एक्टिव कर के पैसे काट लिए. लड़की कंज्यूमर फ़ोरम में चली गई. 3 साल बाद कॉर्ट ने कंपनी पर कुछ सौ रु. का ज़ुर्माना कर दिया. आदमी के पास न तो इतना समय है कि वह 25-50 रु. के लिए सालों कॉर्ट के चक्कर लगाए और न वक़ील को देने के लिए पैसा है. फिर न्यायपालिका विधायिका या कार्यपालिका का मंतव्य भी ऐसा नहीं है कि वह कॉर्पोरेट की ऐसी बेइमानी को रोकना चाहे. अगर कंपनी की 50 रु. की बेइमानी के ख़िलाफ़ आप कोर्ट जाएंगे तो वह आपको 10 साल में 200 रु. ज़ुर्माना दिलवा देगा. ऐसे में इस बुरी व्यवस्था को समाप्त किए बिना कंपनियों की करोड़ों की रोज़ की बेइमानी से छुटकारे का और कोई रास्ता नज़र नहीं आता.

Friday, 8 April 2011

भ्रष्टाचार, अन्ना और जन आंदोलन

जब एक के बाद एक घोटालों की लड़ी लग गई है तो स्वाभाविक रूप से न सिर्फ़ सरकार की किरकिरी हुई है बल्कि भ्रष्टाचार को लेकर जनता में आक्रोश भी पनपा है. अब तक कॉर्पोरेट मीडिया मनमोहन को ईमानदार और आदर्श राजनीतिज्ञ के रूप में पेश करता आ रहा था. अब उसे मनमोहन सिंह पर उँगली उठाने को मजबूर होना पड़ा है. यद्यपि वर्तमान में कोई भी संगठन ऐसा नज़र नहीं आ रहा है जो जनता को लामबंद कर सके. लेकिन मिस्र और अरब देशों में जो कुछ घट रहा है उसे देखकर यहाँ का सत्ता वर्ग बेहद डरा हुआ है. जनता में भ्रष्टाचार को लेकर जो आक्रोश है उससे सत्ता वर्ग परेशान है. राजनीतिक पार्टियों की स्थिति यह है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इस स्थिति में नहीं है कि वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता को लामबंद कर पाए. अगर ऐसा संभव होता तब भी बात बन जाती. ऐसे में अन्ना हज़ारे शासक वर्ग के लिए डूबते को तिनके का सहारा साबित हुए हैं. वह मीडिया जिसके पत्रकार भ्रष्टाचार में करोड़ों की दलाली कर रहे हैं अन्ना हज़ारे के समर्थन में उठ खड़ा हुआ है. रातों- रात उन्हें अच्छा खासा प्रचार मिल गया है. अगर आप अन्ना के साथ आंदोलन में उतरे लोगों पर नज़र डालेंगे तो और भी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी. किरण बेदी जो दो एन.जी.ओ चलाती हैं, जिन्होने आज तक समाज के हित में किसी भी तरह का काम नहीं किया है फिर भी इंद्रा गांधी की गाड़ी उठवाने के कारण व प्रथम महिला आई.पी.एस के कारण मीडिया ने उन्हें समाज की बेहद खास व्यक्ति बना दिया है. बाबा राम देव जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ क़ाफ़ी आक्रामक नज़र आए परंतु जब उनके भ्रष्टाचार की ओर काँग्रेस ने इशारा किया तो उनकी हवा निकल गई. उनके समर्थन में आने वालों में आर.आर.एस और भारतीय जनता पार्टी, उमा भारती, चौटाला आदि हैं. खुद अन्ना बयान दे रहे हैं कि मनमोहन सिंह तो अच्छे व ईमानदार राजनीतिज्ञ हैं उनका रिमोट ग़लत है. मीडिया के प्रचार का आलम यह है कि जो बुद्धिजीवी अपने आप को विचारधारा से तटस्थ बताते हैं वे तुरंत अन्ना के समर्थन में आ गए और अब तो मार्क्सवादी संगठन भाकपा(माले) भी समर्थन में उतर आया है. यह जानते हुए भी कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ़ व्यवस्था के अंदर लड़ी जाने वाली लड़ाई है. और भ्रष्टाचार पर कोई विशेष प्रभाव इससे नही पड़ेगा. यही वजह है मीडिया इस आंदोलन को अच्छी खासी हवा दे रहा है.
सोचने की बात यह है कि जिस लोकपाल बिल के लिए अन्ना को मीडिया इतना प्रचारित कर रहा है क्या इससे भ्रष्टाचार में कोई फ़र्क़ आएगा? दर अस्ल लोकपाल बिल भी भ्रष्टाचार रोकने को सरकार ने जो ढेर सारे कानून बना रखे हैं उनसे बहुत अलग नहीं है, सिवा इसके कि लोकपाल को चुनने की प्रक्रिया थोड़ी भिन्न है और उसे कुछ शक्तियां अधिक दे दीं हैं. अलबत्ता यह सोचने की बात है कि जो व्यक्ति नौकरशाह, क्लर्क, नेता बनता है वह क्यों भ्रष्ट हो जाता है. फिर इस बात का कोई जवाब नहीं है कि लोकपाल बिल का हासिल भी वही नहीं होगा जो दूसरे भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों का हुआ है? जो भी हो अन्ना फ़िलहाल जनता का ध्यान भटकाने में सफल रहे हैं. या कहो कॉर्पोरेट मीडिया का प्रयास सफल हो गया है. दर अस्ल जनता में जो व्यवस्था विरोधी दबाब बढ़ रहा है उस दबाब को कम करने के लिए अन्ना जैसे सेफ्टी बाल्व की सरकार को ज़रूरत भी थी.

Sunday, 9 January 2011

मूल्य और मीडिआ

मूल्य और मीडिआ
-राम प्रकाश अनंत
अक्सर हम रोना रोते हैं कि समाजिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है. प्रत्यक्ष रूप से यह देख भी जा रहा है कि जीवन के हर क्षेत्र का अवमूल्यन हुआ है. जो व्यक्ति को समाज से काट कर देखते हैं उनके लिए इसकी व्याख्या बहुत सीधी हैं. यानी सामाजिक पतन को रोकने के लिए लोगों के आचरण में नैतिक एवं धार्मिक उपदेशों द्वारा सुधार की आवश्यकता है. दर असल यह समझने की आवश्यकता है कि जब संपूर्ण समाज का पतन हो रहा है तब उसके कारण समाजिक आधार में ही सन्नहित हैं और बिना उस आधार को बदले आप सामाजिक पतन को रोक नहीं सकते. दर असल पूंजीवादी प्रवृत्तियों ने पूरे सामाजिक आधार को इस क़दर मूल्यहीन बना दिया है कि एक संदर्भ में हम जिसे नैतिक पतन कहते हैं दूसरे संदर्भ में उसे नैतिक मूल्य कहते हैं क्योंके पूंजीवाद के हित उससे जुड़े होते हैं. कुछ समय पहले धोनी एवं सचिन मीडिया मे छाए रहे. धोनी इसलिए कि उन्होने माल्या के साथ अब तक की सबसे बडी डील की है और सचिन छाए रहे कि उन्होने उसी डील को ठुकरा कर उच्च नैतिक मूल्य स्थापित किए है. मीडिआ ने उनके बारे में लिखा कि सचिन ने साबित कर दिया कि पैसा ही सब कुछ नहीं होता है नैतिक मूल्य भी होते हैं. अगर वास्तव में नैतिक मूल्यों का मामला होता तो मीडिआ को धोनी के बारे में लिखना चाहिए था कि धोनी ने यह साबित कर दिया कि पैसा ही सब कुछ है मूल्यों का कोई अर्थ नहीं है. दर असल मीडिआ का मूल्यों से कुछ लेना देना नहीं है. उसका उद्देश्य है, उसने जो आइडल बनाए हैं उनकी छवि को बनाए रखना(ताकि वे कंपनियों का माल बेच सकें). उसने सचिन और धोनी दोनो का ज़बर्दस्त प्रचार किया.सचिन को इतना प्रचार सिर्फ़ गोपनीय सूचना के आधार पर ही मिल गया. जबकि ऐसा भी संभव है कि इस तरह की कोई डील हुई ही न हो. सोचने की बात है कि इस मीडिया गुणगान से किसे फ़ाइदा हुआ और किसे नुक़सान? इसका समाज पर क्या असर पड़ा?ज़ाहिर सी बात है कि इससे धोनी, सचिन और उन कंपनियों को फ़ाइदा हुआ जिनका वे प्रचार करते हैं. इसका समाज पर यह असर पड़ा कि पैसा कमाना बड़ी चीज़ है चाहे वह शराब के प्रचार से कमाया जाए या किसी दूसरे तरीके से.
सचिन ने अभी अभी कोला के साथ 20 करोड़ की डील की है. माल्या की शराब का विज्ञापन न करना नैतिक मूल्यों की स्थापना है तो कोला का प्रचार करना नैतिक मूल्यों को ध्वस्त करना क्यों नहीं हैं. जबकि यह साबित हो चुका है कि जो पदार्थ इन द्रबो में मिलाए जाते हैं वे शराब की ही तरह स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक़ है.इससे सिद्ध हो जाता है कि मीडिआ किन मूल्यो को स्थापित करता है.मीडिआ जैसे माध्यम का सामाजिक मूल्यो पर गहरा प्रभाव पड़्ता है.अब हम समझ गए होंगे कि सामाजिक मूल्यों का जो पतन हो रहा है वह कहाँ से संचालित है और उसे बदलने के लिए हमें क्या बदलना होगा.

Saturday, 1 January 2011

स्थानीय लोकतंत्र की हक़ीक़त

स्थानीय लोकतंत्र की हक़ीक़त
कल ब्लाक प्रमुख का चुनाव हो गया.जो ब्लाक प्रमुख जीते हैं उन्होने एक-एक क्षेत्र पंचायत सदस्य(B.D.C)को3 लाख से 5 लाख तक दिए हैं .अभी ज़िला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव हुआ हैं जिसमे एक-एक ज़िला पंचयत सदस्य की क़ीमत 25लाख से 60 लाख तक रही.ज़िला पंचायत अध्यक्ष य ब्लाक प्रमुख का चुनाव पूरी तरह गाय- भेंस की खरीद-फ़रोख्त की तर्ज़ पर होता है.ऐसे में अमित भादुडी जैसे अर्थशास्त्रियो को सोचने की ज़रूरत है जिनका कहना हैं -राजसत्ता की नकामी की सबसे अहम वजह रही हैं राजकीय तंत्र का केंद्रीक्रुत दफ्तर्शाहीकरण और स्थानीय लोक्तंत्र पर भरोसे का अभाव मौजूदा राजकीय तंत्र की जगह वैकल्पिक संस्थानिक इंतज़ामात तैयार करने होंगे जो स्थानीय सरकारो,पंचायतो और उनके नीचे की ग्राम सभाओ के ज़रिये काम करे. अगर उन्हें सही ढंग से शक्तिया दी जाए तो यह वैकल्पिक संस्थान ग़रीबो को वेकल्पिक सेवाए मुहैया करने में राजसत्ता की नकामी की समस्या का राजनीतिक समाधान पेश करने में काफ़ी कारगर साबित होगा.दर अस्ल ग़रीबो के मामले मे राजसत्ता की अक्षमता और बाज़ार की निष्ठुरता के बीच के अंतर्विरोध को सुलझाने की ओर बढ़्ने का यही एकमात्र तरीक़ा नज़र आता हे."
सोचने की बात है स्थानीय ग्रामसभा हो ज़िला पंचायत हो य केंद्रीयक्रुत राजसत्ता संसद य विधानसभा उनके मूलचरित्र मे क्या कोई अंतर है?अभी प्रधानी के इलेक्शन मे एक-उम्मीदवार ने 5 लाख से लेकर 25 लाख तक खर्च किए हैं .